
खेतिया। ( प्रधान संपादक रविन्द्र सोनिस ) सामाजिक एवं पारिवारिक एकता का प्रतीक माने जाने वाला महाराष्ट्रीयन त्यौहार कानबाई माता की स्थापना इस माह धूमधाम के साथ घर-घर में होगी। परंपराओं के अनुसार माना जाता है कि शिवाजी के नागपंचमी के बाद पहले रविवार को खान्देश में में कनाबाई या कानुबाई माता के त्यौहार बढे उत्साह से मनाया जाता है। नगर की सुशिलाबाई ने बताया कि कानबाई माता का त्यौहार पुरानी परंपरा है। क्योंकि हमारा मतलब खानदेशियों का मानना है कि कान्हा श्रीकृष्ण है उन्होंने देवी का त्यौहार शुरु करने के लिए कानबाई नाम दिया था। यह त्यौहार को मुख्य रूप से कोली ,सोनार, शिंपी, चौधरी, माली, गुजर समाज में मनाया जाता है। त्यौहार से पहले घरों की साफ-सफाईएवं घरेलू बर्तनों की साफ-सफाई और घर के पढ़ें, चादरें, बेडशीट, कवर सब धोया जाता है।

इसके बाद कानबाई माता की स्थापना परिवार द्वारा माता को बुलावा देकर पूजा अर्चना कर डोल धमाकों के साथ कानबाई माता को लाया जाता है। माता की स्थापना के बाद रात्रि में माता का प्रसाद को रोट कहते है यह रोट तैयार करने के लिए परिवार के सभी महिला पुरुष सदस्यो के द्वारा दो पत्थरो से बनी गटिया पर (चक्की से) परिवार सदस्य अनुसार गेहूं के अनाज को लेकर गटिया पर घुर्णन मतलब अनाज पीसकर आटे से पुरण-पोली खीर बनाकर प्रसाद को परिवार के लोग खाते। महाराष्ट्रीयन परिवार रतजगा कर भजनों की प्रस्तुति देते है। पर्व के दूसरे दिन माता को विदाई अवसर पर बैंडबाजों के साथ शोभायात्रा निकाली जाती हैं और गांव के कुएं समीप विसर्जन किया जाता है।
